जब भी आती हूँ घर  
वर की तलाश में लग जाता है घर भर
आजकल
मेरे लिए लड़का देखा जा रहा है
लगन का सीजन जो चल रहा है
माता-पिता मौन हैं
वे देखना चाहते हैं
मुझे
छूते हुए शिखर को
मेरे
भाई-भौजाई परेशान हैं
रोज एक नया लड़का
खोज लाते हैं
खिलौने की तरह
कहते हैं
इसे पसंद करो
उसे पसंद करो
पहला वाला डाक्टर है
दूसरा वाला इंजीनियर  
तीसरा वाला लेक्चरर है
चौथा वाला बिजनेसमैन
बड़े अच्छे स्वभाव हैं सबके  
एक दम
पुरुषोत्तम राम की तरह
ताजिंदगी सुख देंगे
मैं
सभी को नीचे से ऊपर तक देखती हूँ
फिर बोलती हूँ
थोड़ा वक़्त चाहिए
जिंदगी भर के फैसले का सवाल है
भाई बोलते हैं
कब तक सोचने का बहाना करती रहोगी
तुम्हें
सोचतेसोचते बीत गए ११ साल  
अब २९ की हो चली हो
किसी को तो
हाँ कह दो
इतने अच्छे रिश्ते बार-बार नहीं आते
मैं
जानती हूँ
अपने भाइयों की खूबी
वे  
देखना चाहते हैं
मेरी मांग में
एक किलो सिंदूर
और
गले में मंगल सूत्र का बंधा पट्टा   
और भाभियाँ
वहीँ तो लिखती हैं
इस षड़यंत्र की पटकथा
कितनी मजबूर होती है
एक लड़की
जब करना होता है
उसे मनचाहे
जीवन साथी का चुनाव
अपने ही हो जाते हैं पराये
जब फैसला न हो
उनके अनुकूल
देते हैं दुहाई
इज्ज़त और मर्यादा का
मूल्यों और परम्पराओं का
रौंद देते हैं
अपने ही पैरों तले
खुद के बगिया का फुल
इस बार
फिर बच निकली हूँ
एक अवसर और मांगी हूँ
माँ-पिता से
भाई फिर नाराज़ हैं
भाभियाँ बैठी हैं
कोप भवन में
मैं
निकल पड़ी हूँ
एक बार फिर
खुले गगन में 


डॉ. रमेश यादव सहायक प्रोफ़ेसर,
पत्रकारिता एवं नवीन मीडिया अध्ययन विद्यापीठ,
इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, मैदान गढ़ी, नई दिल्ली.-68
संपर्क : Cell 9999446868
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