शायद,
सोचा था उसने
कि मृत्युदंड की सजा सुन
हार मान लूँगा मैं,
झुकी गर्दन उसकी सजा स्वीकार
तंग काल-कोठरी में
तिल-तिल घुट-घुट मरूंगा मैं,
समझा नहीं कि हार से भी
रार ठान लूँगा मैं,
पर जीते जी उससे कभी
हार नहीं मानूंगा मैं.

हराने को उन्हें लेने होंगे
कई कई जन्म,
क्योंकि,
गिर-गिरकर उठने,
और मर-मरकर जीने का
मैं जानता हूँ इल्म.

शातिर राजनीति के गंदे खेल में
वक्त के हाथों पराजित हूँ,
यह मानता हूँ मैं,
लेकिन,
वक्त की करवटों को भी
बखूबी पहचानता हूँ मैं.
संकल्प कि-
षड्यंत्रों पर पुरुषार्थ की जीत की
एक नई इबारत लिखूंगा मैं.
लाठी-गोली, जेल-मौत से
न डरा, न कभी डरूंगा मैं,
छल-छद्म-तिकड़मों और साजिशों से
अंतिम सांस तक लडूंगा मैं,
मरते-मरते भी
ऐसा कुछ करूँगा मैं,
कि मरकर भी
गुमनाम नहीं मरूंगा मैं.




आनंद मोहन (पूर्व सांसद)
मंडल कारा, सहरसा.
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