''मधुरिमा!..यह आखिरी अवसर है तुम्हारे लिए,यदि इस बार भी तुम्हारे नंबर अच्छे नहीं आये तो तुम्हारा बोर्ड परीक्षा से निकल जाना तय है।।।आखिर  क्या गया है तुमको?पहले तो तुम हमेशा प्रथम आती थी अपनी कक्षा में, ऐसा तो कभी नहीं हुआ था.''
मंजुला मैडम मधुरिमा को डांटती भी जा रही थी और समझा भी रही थी। लेकिन थरथराते पैरों से धरती पर नजरें झुकाए खडी मधुरिमा मूर्तिवत सब सुनती जा रही थी। क्या बताती मंजुला मैडम को की क्या हुआ है उसे?...क्यों उसकी उम्मीदों की दुनिया बिखरती जा रही है?..क्यों उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता, आंसू गालों पर बहते  हुए उसे और निरीह बना रहे थे।
''बोलो मधु।।चुप क्यों हो?तुम्हारी चुप्पी खल रही मुझे,..तुम मेरी सबसे मेधावी छात्रा हो, मेरी उम्मीद हो तुम''..बोलते बोलते मंजुला मैडम की आवाज भर्रा गई.
''मै  कोशिश करूंगी मैडम'' मधुरिमा ने भींगी पलकें उठाकर उन्हें देखा और दोनों हाथ जोड़ दिए थे। मंजुला मैडम उसकी पीठ थपथपा  कर वापस चली गई थीं.
                                                                 *****
         पर मधुरिमा के अंतर्मन में छाया अँधेरा और गहरा गया  था। अपने हॉस्टल के कमरे में वापस लौट कर चुपचाप  पलंग पर लेट कर ,सूनी दीवारों को घूर  रही थी। कभी यही दीवारें उसे इंद्र  धनुषी  रंगों में सजी धजी नजर आती थीं। पर आज सब कुछ धूमिल ..बेरंग नजर रहा था। उसकी रूममेट पुनीत शायद
लायब्रेरी चली गई थी। कमरे का अकेलापन उसे चुभ रहा था। उसके चारो तरफ उसके सपनो की किरणें बिखरती जा रही थीं।।। एक असहाय रुदन बार बार उसके होठों तक आता और अव्यक्त रह जाता। ...कितनी उम्मीदें लेकर आई थी वह यहाँ ..अपनी उपलब्धियों से आकाश नाप लेना चाहती थी ..पापा की तरह इंजीनियर बनना था उसे, अपनी किताबें,,,,अध्ययन नोट्स ,,नियमित कक्षाएं इन सबमे खो जाना चाहती थी मधु,,,पर कुछ महीनों से अचानक अथक परिश्रम के बावजूद अंग्रेजी में उसके नंबर कम आने आने लगे थे, सभी प्रश्नपत्र  बनते फिर भी कुछ नंबरों से वह पिछड़ जाती या फेल हो जाती ,,जिससे उसका मनोबल टूटता जा रहा था। घर पर भी उसका मन नहीं लगा। माँ ने तो उसे उदास देख कर पूछा भी था-''क्या बात है मधु? मुझे बता ? कोई परेशानी है क्या?'' पर बेटी के साथ कुछ दिन बिता पाने की खुशी और उनके चेहरे पर झलकती वात्सल्य की किरणें  देख कर,,, मधु ने माँ को कुछ नहीं बताया था। और हॉस्टल खुलने के पूर्व ही लौट आई थी. जब वह लौटी तो पूरा हॉस्टल लगभग खाली हो चुका था।
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''कोई है क्या ?,,,राम सिंह दरवाजा खोलो,''दोनों कंधो पर बैग लटकाए वह दरबान को आवाज देने लगी, वह भागता हुआ आया---अरे मधु बिटिया ,बड़ी जल्दी लौट आई ?''
हाँ मुझे  पढाई करनी थी,सभी चले गए क्या ?
-''नहीं नहीं.. रुम  नंबरक़ी रुमा और सपना यहीं हैं ,,और भी लड़कियां हैं''
--''अच्छा ठीक है''
 मधुरिमा ने बैग उठाये दरबान के पीछे पीछे चलते हुए , नीचे बड़े हाल में झांक कर देखा था वहां विजय सर ,मंजुला मैडम और मनु सर बैठे ,चाय पी रहे थे,उसने राहत  की साँस ली थी कि  अब वह विजय सर से कुछ पढ़ भी लेगी आगे की परीक्षाओं के लिए,विजय सर उसके अंग्रेजी के अध्यापक थे,,शाम का खाना खाकर वह अपनी सहेलियों से मिली सभी खुश थीं,,, बातो बातो में पता  चला कि वे दोनों भी विजय सर से पढती हैं,,स्कूल ख़त्म होने केबाद ,,रात आठ बजे,,,''पहले तो उसे कुछ अटपटा लगा ,फिर सोचा कि हर्ज ही क्या है? पढ़ कर ही तो रुमा और सपना के अंक अच्छे  आते हैं,,,,उस दिन वह भी विजय सर की कक्षाओं में शामिल हो गई,,,उसकी पढने की इच्छा जान  कर उन्होंने विचित्र ढंग से देखा था उसे,जिसे मधु ने यह सोच कर टाल  दिया कि वह सबसे कमजोर छात्रा  है इसलिए वह सबका केंद्रबिंदु है, पढाई भी कुछ दिनों तक ठीक ठाक रही, फिर धीरे धीरे उसे कुछ और विशेष पढ़ाने और नोट्स लिखवाने के बहाने विजय सर उसे कुछ और देर तक रोकने लगे थे,उस समय तो सर उसे किसी देवता के सामान ही लगे जो उसका इतना ध्यान रख रहे हैं ,रुमा  और सपना के जाने के बाद वह उसके पास आकर पढ़ने लगते---माई हार्ट लिप्स अप --व्हेन आई सा ए रेन बो इन द स्काई ''--बोलते बोलते  वे उसके और करीब जाते और वह उनकी साँसें सुन सकती थी,इस स्थिति से मधु असहज और भयभीत हो जाती थी,,,,उसने आगे ट्यूशन  जाने का फैसला कर लिया .
पर एक दिन स्कूल  की कक्षा समाप्त  होने के बाद उन्होंने उसे रोक लिया -''देखो मधु, ट्यूशन बंद मत करो, वर्ना बोर्ड की परीक्षा में बैठने नहीं दूंगा बुरे नम्बरों से फेल हो जाओगी तुम, समझी?''
वह सचमुच डर  गई थी,फेल होने या बोर्ड की परीक्षा देने का मतलब उस सोलह वर्षीया किशोरी के लिए उसके अरमानो की दुनिया का लुट जाना था,शहीद पिता और माँ की उम्मीदें ,,उसके सपने सभी दांव पर लगे थे,वह मजबूर होकर पुनः उनकी ट्यूशन में गई.
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उस दिन जब सभी छात्राएं चली गईं तो अचानक विजय सर कराहते हुए बैठ गए,सर पकड़ कर ,,मधु उस समय अपनी किताबें समेट रही थी,-''मधु जरा मेरा सिर  दबा दों ,काफी तेज दर्द हो रहा है,''मधु को इस अचानक उठे दर्द का रहस्य समझ में नहीं आया और वह घबरा कर सर दबाने लगी,,,तभी विजय सर ने पानी पीने बहाने दरवाजा बंद कर लिया ,,मधु सहम गई थी,,,उस दिन गुरु शिष्य के पावन संबंधो को तार तार होते देखा था मधु ने ,,उसकी चीखें उस बंद कमरे में घुट कर रह गई थीं उसके सपने,,,उसका घायल मन,उसका बचपन, उसकी मासूमियत दम तोड़ रही थी उसका कोमल किशोर वय  कुछ नहीं समझ पा रहा था,
उस नर पिशाच ने उसे डी वी  डी  चला कर  दिखाया भी था कि ,,,रात उसके साथ क्या हुआ था? फिर कहा--'''चिंता मत करो,अब तुम फेल नहीं होगी,,,बस ऐसे ही  रहना ,रुमा और सपना की तरह ''
मधु चकरा  कर गिर पड़ी,,ओह!,,तो ये सब जान बूझ  कर ,, नंबर कम आना,, फेल कर देना,, उस रात की स्वप्निल भोर की प्रतीक्षा दम तोड़ गई थी,,,वह सुबह कहीं खो गई थी ,,जब भजन गुनगुनाते संगीत स्वर लहरियों के साथ मधु अपनी आँखें खोलती थीं ,,उस सुबह उसकी आँखें आंसुओं से भारी थीं. वह क्या जवाब देगी माँ को?,,पापा जैसे इंजीनियर बनाने का सपना उसने ही तो दिखाया था अपने परिवार को,,,एयर फ़ोर्स में इंजीनियर पिता की पुल बनवाते समय एक आतंक वादी विस्फोट में  जाने के बाद तिरंगे में लिपटे पिता के शव को छू कर अपने आप से एक वादा किया था उसके भावुक बचपन ने --कि वह एक ऐसा पुल बनवायेगी जो किसी विस्फोट में नष्ट नहीं होगा. अब वह क्या कर पायेगी? उसकी सहेलियां उसके दोस्त सभी तो हंसेगे उस पर,,,,वह जितना सोचती उतना उलझती जा रही थी, ,, निराशाजनक विचारों ने उसकी सोच को भटका दिया था. कभी वह खुद को फांसी के फंदों  पर लटका देखती, कभी फिनाइल पीते, कभी घबराकर उठ बैठती और पागलों की तरह दुपट्टे से फांसी का फंदा बनाने की कोशिश करती और असफल रह जाती, कांपते हाथ  कुछ भी नही कर पा रहे थे,,,नहीं,,नहीं,,नहीं जीना है उसे, उस रात अर्ध बेहोशी की अवस्था में  मधु ने सपने में पापा को देखा था ,,,वही एयर फ़ोर्स की लक दक वर्दी में,,हँसते मुस्कराते तिरंगे को सलामी देते,,,पापा,, पापा मुस्कराए मानो  कह रहे हों --''उठ मधु! अपना  सपना पूरा कर बेटी, तुझे हारना नहीं है,,,,अन्याय करने वाले से ज्यादा दोषी अन्याय सहने वाला होता है,तुम्हे जीना है दूसरों के लिए,, अपने देश के लिए,,तुम्हारा जीवन कीमती है बेटा,उसे गंवाना नहीं,,अन्याय का प्रतिकार करो''------- 
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बस ,वही एक क्षण था फैसले का,,,वह झटके से उठ बैठी ---''अरे  यह क्या सोच रही थी मै ? मेरे जाने के बाद माँ का क्या होगा और वह राक्षस..वह तो फिर किसी और को?,,नहीं नहीं,,बस अब और नहीं,, अब यह अन्याय नहीं सहूंगी,,कोई और अपमानित हो  इसके पहले अपराधी को दंड देना जरुरी है,''उसने वहीँ रखा भारी पेपरवेट उठाया और जोर से विजय  सर के सिर पर दे मारा...खून फव्वारों की तरह बहने लगा था, ,,,,,,वह उसी अवस्था में  विक्षिप्तों की तरह बस,,अब और नहीं,, दृढ़ शब्दों में दोहराते  हुए मंजुला मैडम और प्रिंसिपल के कमरे की और दौडती चली गई।


-पद्मा मिश्रा
LIG --1 1 4 --रो हॉउस, आदित्यपुर-2, जमशेदपुर -1 3
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