बताओ

बाहर की दुनिया कैसी है
तुम
कितनी आज़ाद और सुरक्षित हो
कैसे बेख़ौफ़ उड़ती हो
खुले आसमान में
अदभुत
है न
तुम्हारा जीवन
देखो
एक हम हैं
अँधेरे में बंद
रौशनी से मरहूम
तुम्हारी तरह तो बिल्कुल नहीं
हम
दोनों एक दूसरे से अलग क्यों ...?
प्रकृति
ने क्या सोचा होगा
हम दोनों को बनाया
मन
कह रहा है ...उड़ चलें
काश...!




डॉ रमेश यादव, 
सहायक प्रोफ़ेसर, इग्नू 
नई दिल्ली 
 
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