कोख के अंदर
मादा भ्रूण ने पलकें झपकाईं
पापा !
वह विह्वल हो चिल्लाई
आप कितने हैंडसम हैं और स्मार्ट !
मैं आपकी बाहों में झूलने को
बेताब हूँ
ऑफ ! कब मैं आपकी उंगली पकड़
घर भर में घूमूंगी !
उसने मुंह लटकाया
पता नहीं/ माँ सामने से कैसी दिखती है
मैंने तो बस आईने में
उनकी परछाईं भर देखी है
दीदी !
कब मैं तुम्हारी तरह
बालों में रिबन बांधूंगी
अच्छा रुक,
तू मुझे बाहर आने दे
फिर देखती हूँ
कैसे अकेले राज करती है
पूरे घर पर !
तेरे सारे खिलौने लेकर
चम्पत हो जाउंगी !
और ये पूसी
खूब ललचाती है मुझे
पर जब मुंह खोल
म्याऊं करती है
तो उसके नुकीले दांत
डरा ही देते हैं मुझे !
अच्छा,
तो दादी आई हैं
वाह ! झुर्रियों में भी सुन्दर !
मां तो दौड़-दौड़कर
उनकी खातिर में लगी हैं
मुझे भूलकर !
मां !
जरा धीरे चलो न,
देखो मैं कैसे हिल-हिल जा रही हूँ !
अरे,
खा-पीकर दादी की झुर्रियां
गंभीर क्यों हो गईं ?
पापा भी सीरियस हैं
कुछ खुसुर-पुसुर चल रही है
पर मां का रोआं-रोआं
सिहरन से क्यों भर गया ?
भ्रूण ने आँखें विस्फारित कीं
कान खड़े किए
मां शायद दरवाजे से लगी खड़ी थी
पापा बोले-
डॉक्टर से बात हो गई है
चलो, तैयार हो जाओ
डॉक्टर ?
किसे क्या हुआ है ?
भ्रूण की चिंता बढ़ी
वैसे तो सभी ठीक-ठाक हैं
पर मां सुबक रही थी-
नहीं, मैं नही जाउंगी
पर पापा की मुद्रा
न्यायाधीश की थी
और दादी
ज्यूरी की भूमिका में
जेलर मां को
न्यायाधीश पापा ने
कैदी को मुक्त करने का
फरमान सुना दिया
मां मुझे ढोती
अस्पताल पहुंची
पर जेल गेट के बीचो-बीच
मां खड़ी थी
डॉक्टर ने मां को परे हटाया
और दरवाजा खोल दिया-
मैं खुश थी
लो अब तितली बन
बाहर की दुनियां में उडती फिरुंगी !
पर ये क्या
मुझपर धुंध क्यों छाने लगी ?
आँखें मुंदी जा रही हैं
मेरी मुट्ठियां क्यों नहीं बंध रही ?
मेरा दम क्यों घुटा जा रहा है !
मां !
पापा........
दीदी........
दादी........
कोई तो मुझे संभालो !
पता नहीं डॉक्टर ने क्या किया
मैं तो कवच के अंदर हूँ
फिर भी मुझे ये क्या हो रहा है......
मां......
और अगले ही क्षण
भ्रूण
मांस के लोथड़े में तब्दील था.


-डॉ० शान्ति यादव ,प्राचार्या 
एसएनपीएम हाई स्कूल, मधेपुरा.
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