अंजू
हाँ, ठीक कहा बहना तूने !
अब आने लगी याद मुझे भी,
श्रद्धा और उर्वशी की.
मैं भी बन गयी थी कितनी एकांगी?
आधुनिकता की इस सोच में
आखिर सोचा भी तो क्या सोचा?
केवल शूर्पनखा को सोचा...
श्रद्धा, सावित्री और उर्वशी को भी तो
स्वतंत्रता थी अभिव्यक्ति की,
पसंद की, चयन की, वरण की
शूर्पनखा की ही तरह.
सावित्री तो समर्पिता है, ज्ञान की खान है
संस्कृति शिखर स्वरूपा है,
छोडो उसकी तो अलग बात.
लेकिन
चौखट पार नहीं किया कभी
श्रद्धा और उर्वशी ने भी.
पसंद किया था, वरण किया था
और किया था सर्व समर्पण,
और पश्चात वरण के उसने
चौखट का भी मान रखा था,
अलग एक पहचान रखा था
नहीं कभी द्वेषपूर्ण तकरार रचा था.
होती हैं अप्सराएँ अतिस्वच्छंद
लेकिन उर्वशी ने भी इस चौखट का
देखो कितना मान-सम्मान रखा था.
   हाँ,
चौखट को पार किया था मनु ने
फिर कलह संत्रास को भोगा था.
व्यथित हुए थे, व्यग्र हुए थे
क्रुद्ध हुए थे..., क्षुब्ध हुए थे...
था अभिमान जो अपने ज्ञान का,
तप का अभिमान भी कम न था
    लेकिन हो अभिमान जहाँ   
समरसता फिर जीवन में कहाँ?
फिर शांति की प्रत्याशा में
आखिर लौटे उसी चौखट पर,
तब श्रद्धा ने ही विकल मनु को
समरसता का पाठ पढाया,
हाथ पकडकर कर राह दिखाया
लक्ष्य बताया, आनंद स्वरुप
मोक्ष तत्व को प्राप्त कराया.
हाँ, ठीक कहा बहना तूने!
यह सब संभव हुआ तभी जब
चौखट को छोड़ा उसने न कभी.
लेकिन बहना कुछ खटकता फिर भी,
क्या यह चौखट हमें फिर से
निरक्षर पिछड़ा तो नहीं बना देगा?
बेड़ियाँ फिर से तो नहीं पहना देगा?

संजू:
हंसकर बोली अपने सखि से-
तू भोली है ! कुछ पगली भी !!
ज्ञानार्जन और सृजनात्मक-कर्म
अतिक्रमण नही है चौखट का.
वह तो है बस एक कौतुहल,
और श्रृंगार इसी कौतुहल का.
लेकिन जिसमे सृजन नहीं,
परिणाम हो जिसका विषाद,
तू समझ उसी को ही अतिक्रमण
जिससे अवसाद और घोर-विषाद.
चौखट यह केवल मर्याद ही नहीं,
यह दायित्व भी है और प्रायश्चित भी.
लक्ष्मण को तो बनवास नहीं मिला था
वे साथ गए थे यदि राम के
तो केवल इसी चौखट के कारण.
और भारत को मुकुट मिल रहा था-
राजमुकुट, जिसके लिए जंग होते रहे हैं
लेकिन उनको दिखा इसमें, एक षड्यंत्र.
था यह चौखट ही जो उसे ठोकर मार सके.
   और प्रायश्चित को प्रस्तुत हो सके.      
   था तब भी यह चौखट ही जब लक्ष्मण
   राजाज्ञा का विरोध न कर सके और
   निर्वासित किया था सीता को निज हाथों.
स्वयं कैकेयी ने ही
कहाँ किया था उलंघन चौखट का,
उलंघन तो किया था 
उसकी बुद्धि ने, मति ने, सोच ने.
इस बुद्धि को, मति को, सोच को ही
नियंत्रित हमें करना होगा, करना होगा..

अंजू-
धन्य-धन्य तू बहना मेरी!
धन्यवाद करूँ तुझे कैसे अर्पण?
बिलकुल ठीक कहा था तूने
चौखट एक रखना ही होगा,
हाँ, है यह जरूरी, इसे रखना ही होगा.



डॉ. जयप्रकाश तिवारी 
भरसर, बलिया
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