ये बड़े अखबार/ मीडिया निराले हमारे हैं
अधिकाँश पूंजीपतियों के पाले हुए बेचारे हैं

सत्ता के इर्द-गिर्द मडराते रहते हैं
जनतंत्र/ मानवाधिकार के कथित रखवाले हैं

ये हैं शासन के चौथे-स्तंभ कहे जाते
पर लाखों शिक्षित युवकों के शोषक काले हैं

जी रहे सेक्स/स्कैम/स्कैंडल के नाम पर
पर खुद करवंचना के किस्से पाले हैं

अपराध और दुर्घटनाएँ छापें बाधा-चढाकर
तिल का ताड़/ राई का पहाड़ परोसने वाले हैं

कोने में छापते ज्ञान-विज्ञान- शोध/संक्षिप्त
और साहित्य/सर्जना को हाशिए पर डाले हैं

इनके कुकर्मों का हिसाब कौन ले भला
जब जनता सोई और हम बैठे ठाले हैं.



डॉ रामलखन सिंह यादव
अपर जिला जज, मधेपुरा.
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