हिन्दू विवाहिता के सुहाग के प्रतीक के रूप में मंगलसूत्र अभी तक सबसे चर्चित प्रतीक हुआ है. भारतीय फिल्मों ने भी इस सुहाग कि निशानी को 'हिट' करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. मंगलसूत्र विवाहिता द्वारा गले में पहनने का जेवर है. जिस तरह ईसाई धर्म में अंगूठी एक अत्यावश्यक प्रतीक है, ठीक उसी तरह हिन्दू धर्म में 'नेकलेस' यानि मंगलसूत्र विवाहिता का एक अत्यावश्यक प्रतीक चिन्ह है जो सदियों से प्रयोग में लाया जाता रहा है.
          इतिहास में मंगलसूत्र: 'कूर्ग' का वैवाहिक गले का हार काले छोटे दानों से बना होता था जो सोने की कड़ियों से आपस में जुड़े होते थे. एक इसी तरह के नेकलेस मोहनजोदड़ो में भी खुदाई से प्राप्त हुआ है. प्राचीन काल में अष्ठ्मंग्लक माला भी इसी की कड़ी माना जाता है, जिसमे आठ प्रतीक होते थे और बीच में एक 'लॉकेट' हुआ करता था जो साँची के बुद्धिस्ट प्रतीक के रूप में अपनाया गया है.
         अपने मूल रूप में 'मंगलसूत्र' या 'करथा मणि' काले धागे में गूथे हुए आठ मोतियों से मिलकर बना होता था जिसमे बीच में एक सोने का ' लॉकेट ' गोल आकार का स्थित होता था. काले रंग की प्राथमिकता इसमें होने का मतलब ये माना जाता था की दुल्हन को कोई बुरी नजर न लगे. परन्तु वर्तमान में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में ये अलग-अलग स्टायल में लोकप्रिय हो गया है.
              जो भी हो मंगलसूत्र वैवाहिक प्रतीकों में सबसे मत्वपूर्ण स्थान तो रखता ही है,साथ ही ये माना जाता रहा है कि ये दुल्हन के लिए काफी शुभ होता है और उसे बुरी नजर से बचाते हुए उसे भाग्यशाली बनाती है.
      हालाँकि फैशन के इस दौर में और पाश्चात्य सभ्यता के असर के कारण आज के युवा वर्ग पुरानी सारी मान्यताओं को बेमानी मानकर चल रहे हैं. ऐसे में हिन्दू विवाह के पुराने असरदार रिवाज कबतक अपना अस्तित्व बनाये रखते हैं, देखना बाक़ी है.


साक्षी, मधेपुरा.


  

(साक्षी का ब्लॉग है: http://sakshikikalamse.blogspot.in/)
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